Wednesday, March 11, 2009

शिव सूत्र

गुरु शिव सत्ता ने आध्यात्मिक परिबेश की स्थापना धाम में सर्बयापक करने हेतु बर्तमान काल खंड में शिव-शिष्यता निबधी गति से प्रारम्भ के है. शिव- शिष्यों ने शिव गुरु के सभी महत्ब्पूर्ण आयामों से जनमानस को अबगत आरते हुए उनका शिष्य बनने का उद्घोष किया है. लाखो लोगों ने इस तथ्य परक और सत्य परक आबहन को सहर्ष स्बागत करते हुए शिव गुरु की शिष्यता ग्रहण की है. इतना ही नहीं, गुरु शिव सत्ता की शिष्य भाव संप्रेषण की प्रगाढ़ता की निरंतर जागृत रखने के लिए शिव शिष्य ने त्रिबिधा नामक सूत्र(साधन) आबम् की उपलब्ध करबये है.

बे सूत्रों है :- प्रथम- " हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य/शिष्या हूँ. मुझ शिष्य/शिष्या पर दया करें". इसे जब भी समय मिले, याद आये, मन ही मन दुहरा लें.

द्बितीय- शिव की गुरु स्वरुप की चर्चा सुने तथा अपने खाली एबं बेकार समय में शिव गुरु की चर्चा गुनानुबद्पुर्बक करें.

तृतीय- गुरु शिव की उनके मंत्र " नाम: शिवाय:" का जप १०८ बार रुद्राक्ष माला अंगुलिया पर या सूबिधानुसर मानसिक जप कर गुरु शिव को प्रणाम करना अनिबर्य हैं.

स्म्भ्बे गुरुबे नम: महेश्बर शिव ही गुरु है

आद्धात्मिक जगत के प्रकाश स्तम्भ महेशवर शिव ही हैं. शिव गुरु का शिष्य बनने में किसी भेद-भाब नहीं है. लिंग, संप्रदाय, धर्म, जाती,बर्न, ओर बर्ग का भेद शिव शिष्यता ग्रहण करने में बाधक नहीं होते. कोई भी जिब जगद गुरु शिव का शिष्य बनने का अधिकार धारित करता है.
गुरु शिव भाव सत्ता है. गुरु से हम शिष्यों का सम्बन्ध स्थापित हो इसके लिए साधना की आबश्यकता है. इस साधना से मन के म़ल और आबरण हटते हैं एबं मन की सफाई होती है. मन की चंचलता नस्ठ होती है. साधना से भ्रम और भय दूर होते हैं. साधना से प्रेम का रिश्ता मजबूत होता है, प्रेम का आधार होता है भाव. गुरु शिव सत्ता भाव सत्ता है. बे भाव से भाबित होते है. " भाबेन लभते सर्बम लभते देबता". शिव गुरु के सामख दृष्टा-भाव में बैठकर केवल गुरु के देखते रहना है. यही समर्पण योग है.