आद्धात्मिक जगत के प्रकाश स्तम्भ महेशवर शिव ही हैं. शिव गुरु का शिष्य बनने में किसी भेद-भाब नहीं है. लिंग, संप्रदाय, धर्म, जाती,बर्न, ओर बर्ग का भेद शिव शिष्यता ग्रहण करने में बाधक नहीं होते. कोई भी जिब जगद गुरु शिव का शिष्य बनने का अधिकार धारित करता है.
गुरु शिव भाव सत्ता है. गुरु से हम शिष्यों का सम्बन्ध स्थापित हो इसके लिए साधना की आबश्यकता है. इस साधना से मन के म़ल और आबरण हटते हैं एबं मन की सफाई होती है. मन की चंचलता नस्ठ होती है. साधना से भ्रम और भय दूर होते हैं. साधना से प्रेम का रिश्ता मजबूत होता है, प्रेम का आधार होता है भाव. गुरु शिव सत्ता भाव सत्ता है. बे भाव से भाबित होते है. " भाबेन लभते सर्बम लभते देबता". शिव गुरु के सामख दृष्टा-भाव में बैठकर केवल गुरु के देखते रहना है. यही समर्पण योग है.
Wednesday, March 11, 2009
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